इजराइल के इस हथियार का तोड़ किसि के पास नही,हवा में ही मार गिराया उड़ता हुआ ड्रोन

इजराइल के इस हथियार का तोड़ किसि के पास नही,हवा में ही मार गिराया उड़ता हुआ ड्रोन

इजराइल भले ही एक छोटा देश हो लेकिन तकनीक के मामले में वह दुनिया के कई बड़े देशों से भी आगे है।इजराइल अपनी तकनीक के कारण अत्याधुनिक व घातक हथियार बनाता है जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती है।जैसे इजराइल द्वारा बनाये गए डिफेंस सिस्टम दुनिया मे सबसे आधुनिक व घातक मनये जाते हैं,इसी प्रकार से इजराइल द्वारा बनाये गए ड्रोन भी पूरी दुनिया की पसंद बने हुए हैं।लेकिन अब इन सब से ऊपर उठकर इजराइल ने एक ऐसी तकनीक या ये कहें कि एक ऐसा हथियार बनाया है जिसका तोड़ पूरी दुनिया के ओएस नही है।

क्या है वो हथियार?

दरअसल अब दुनिया फ्यूचर वारफेयर यानी भविष्य के युद्ध की तैयारी में जुट गई है जिसमे पारंपरिक हथियार न के बराबर प्रयोग किये जायेंगे बल्कि नई पीढ़ी के अत्याधुनिक हथियारों से भविष्य में युद्ध लड़े जाएंगे।ऐसे में सभी देश नए पीढ़ी के हथियारों और तकनीक को बनाने में लग गए हैं।इसनमे से लेज़र तकनीक को भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण तकनीक बताया जा रहा है है लेज़र हथियारों को सबसे घातक हथियारों का दर्जा मानो मिल गया है।

इस वक्त दुनियाभर के देश लेज़र तकनीक व लेज़र हथियारों को बनाने में लगी है।इसी बीच इजराइल ने लेज़र तकनीक ला सबसे पहले हथियार के रूप में परीक्षण कर लिया है।दरअसल हाल ही में इजराइल की सेना ने एयरबॉर्न लेज़र गन का सफल परीक्षण करते हुए हवा में उड़ रहे एक ड्रोन विमान को मार गिराया।इसकी चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि ड्रोन को भी अगली पीढ़ी के युद्ध के लिए बहुत उपयोगी बताया जा रहा है और इसी बच्च इजराइल ने बड़ी ही आसानी से ड्रोन विमानों को गिराने की तकनीक विमसित कर ली।

क्या होती है लेज़र तकनीक व हथियार?

लेज़र तकनीक एक अत्याधुनिक व बेहद घातक तकनीक है जिसे की भविष्य के युद्ध के लिए सबसे जरूरी बताया जा रहा है।इस तकनीक में एक हाई एनर्जी बीम यानी एक बहुत ज्यादा ऊर्जा वाली बिल छोड़ी जाती है जो कि अपने टारगेट को जला देती है या फिर उसमें छेद कर देती है जिससे कि वह हवा में ही नष्ट हो जाता है या तुरंत जमीन पर गिर जाता है।अब जो हथियार ऐसी लेज़र बीम को छोड़ सकते हैं उन्हें ही लेज़र हथियार कहते हैं।जितनी ज्यादा ऊर्जा की बीम होगी उतना ज्यादा व जल्दी तभाही देखने को मिलेगी।हालांकि इजराइल के मुताबिक अभी पूरी तरह से इसे विकसित होने में इसे 4-5 साल लग सकते हैं।

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